अहंकार – एक ऐसा तत्व जिसका कहीं कोई उपयोग नहीं !

Gitaपुराने समय की बात है , एक ऋषि के पास एक व्यक्ति तत्त्व-ज्ञान-साधना के लिए गया। दीक्षा प्राप्ति के उपरान्त  शिष्य ने गुरु से  गुरु-दक्षिणा का आग्रह किया। गुरुदेव शिष्य के मन की बात समझते थे  – हुआ कुछ ऐसा था कि गुरु जी की  कुछ बताई विधियाँ  उसने पहले से पढ़ी हुई थीं  और उन कुछ पलों में शिष्य के मन में यह भाव आ गया था कि गुरुदेव की कम से कम  ५०% शिक्षा  तो व्यर्थ ही है।  गुरु दक्षिणा की बात पर गुरु ने युवक से कहा कि जीवन के इस पड़ाव में वह कोई भी कीमती  या  उपयोग की वस्तु बल्कि कुछ अलग चाहते हैं।  उन्हों ने आग्रहपूर्वक कहा कि  वह दक्षिणा में उन्हें ऐसी चीज दे जो बिलकुल व्यर्थ हो , वो चीज ऐसी होनी चाहिए कि किसी के भी  काम न आ  सके।  शिष्य आज्ञा लेकर व्यर्थ की  चीज की खोज में निकल पड़ा।

रास्ते में उसे मिट्टी दिखी तो उसे उससे ज्यादा व्यर्थ कुछ नहीं लगा। पर जैसे ही उसने  मिट्टी की ओर हाथ बढ़ाया तो मिट्टी बोल पड़ी, “तुम मुझे व्यर्थ समझ रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं है कि इस दुनिया का सारा वैभव मेरे ही गर्भ से प्रकट होता है?  ये विविध वनस्पतियां ये रूप, रस और गंध सब कहां से आते हैं? यह तुम्हारा शरीर  मुझसे ही  पैदा  हुआ है ? क्या  तुम्हे मैं  अब भी व्यर्थ  मालूम पड़ती हूँ?”

शिष्य शर्मिन्दा हो कर आगे बढ़ गया, थोड़ी दूर पर उसे एक  बेडौल  सा  पत्थर मिला। शिष्य ने सोचा, इसे ही ले चलूं।  उसने लेकिन जैसे ही उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पत्थर से  आवाज आई , हे तत्त्व शक्ति विज्ञानी ! तुम इतने जानकार  होकर भी मुझे बेकार मान रहे हो। तुम अपने भवन और अट्टलिकाएं किससे बनाते हो? तुम्हारे मंदिरों में किसे गढ़कर देव प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं? मेरे इतने उपयोग के बाद भी तुम मुझे व्यर्थ मान रहे हो।
यह सुनकर शिष्य निरुत्तर हो गया और वहां से भी चल दिया। इसके बाद कई और ऐसी चीजें उसने गुरु जी के लिए लेनी चाहीं लेकिन उसे हर जगह काम की चीजें ही नजर आईं। उसने सोचा कि जब मिट्टी और पत्थर, यहां तक कि जहर भी  इतने उपयोगी है तो आखिर व्यर्थ क्या हो सकता है?
उसके मन से आवाज आई कि सृष्टि का हर पदार्थ अपने आप में उपयोगी है। वस्तुतः व्यर्थ और तुच्छ वह है, जो दूसरों को व्यर्थ और तुच्छ समझता है। व्यक्ति के भीतर का झूठा-अहंकार ही एक ऐसा तत्व है, जिसका कहीं कोई उपयोग नहीं। वह गुरु के पास लौट गया और उनके पैरों में गिर पड़ा ।  अंततः  वह शिष्य  गुरु दक्षिणा में अपना अहंकार देने आ चुका  था। 
गुरु तो बैठा ही है सब कुछ लुटाने …  तुम्हारे पात्र को अमृत  से भरने।  पर तुम हो कि उसमे व्यर्थ के अहंकार को , व्यापार को, परिवार को भरे बैठे हो।  जीवन भर भागते  रहो ऐसे  , कुछ होने वाला नहीं  है। देर तो तुम्हारी तरफ से है।  बस इधर पात्र खाली किया  और उधर अमरत्व को प्राप्त हुए।  शिष्य और गुरु के बीच , साधक और सिद्ध के बीच में केवल अहंकार ही एकमात्र फासला है। 
शिवोहम !
– आचार्य अज्ञातदर्शन आनंदनाथ 
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